Good News!!! बात पते की लेख श्रृंखला को इस ब्लाॅग पर पुनः शुरू किया जा रहा है। इस सीरीज के तहत व्यंग्य लेख काव्य प्रेरणा के पाठकों के लिए पोस्ट किये जाएंगे।

Wednesday, 7 December 2016

'जैसलमेर के नाम पाती' कविता

दिांक 04 दिसबंर 2016 को बीकानेर से प्रकाशित दैनिक अखबार दैनिक युगपक्ष में प्रकाशित कविता-



Monday, 19 September 2016

पतन - Hindi Kavita By Ram Lakhara Vipul

हड़प्पा और जोदड़ो संस्कृतियां अपने चरम पर होने के बावजूद नष्ट हो गई, इसका कारण कुछ तो रहा होगा। वर्तमान परिस्थितियों को आधार बनाकर लिखी गई एक रचना प्रस्तुत है-

सुनहरे भविष्य की आड़ में 
हम अतीत को अपने गढ़ रहे
लगता नहीं क्या हड़प्पा और 
जोदड़ों की ओर हम बढ़ रहे

करते पाप को पुण्य बताकर, 
बनाते धर्म को इक व्यापार
विकास के नव स्वप्न दिखा, 
बेचतेे गरीब का घर परिवार
नव सृजनता को लिए चले थे, 
नित नग्नता को पढ़ रहे

लगता नहीं क्या हड़प्पा और 
जोदड़ों की ओर हम बढ़ रहे

ram lakhara vipul


शोर गूँज रहा आजादी का, 
तो क्यों पर्दे लगते है
जिन लोगों को सौपी सत्ता
वो लोग ही क्यों अब ठगते है
गौरव हमारा हिमालय है, 
क्यों एफिल टाॅवर चढ़ रहे

लगता नहीं क्या हड़प्पा और 
जोदड़ों की ओर हम बढ़ रहे

जिन जिन को कहा माता हमने, 
कर दिया उनका जीना दुश्वार
माँ को बेघर, गौ को काटा, 
अबला होती दुष्कर्म शिकार
गौरवशाली चादर पर हम, 
नित काले कशीदे कढ़ रहे

लगता नहीं क्या हड़प्पा और 
जोदड़ों की ओर हम बढ़ रहे

अपना घर बचाने को, 
घर पड़ोसी का जलाते है
मन में हो चाहे कंकड़ पर, 
मिथ्या शिष्टाचार निभाते है
खुद के बुरे कर्मों का दोष, 
दूसरे के मत्थें मढ़ रहे

लगता नहीं क्या हड़प्पा और 
जोदड़ों की ओर हम बढ़ रहे

लोभी दंभी चोरों का 
अब बोलबाला हो रहा
निर्धन नेक परिश्रमी 
नित मौत निवाला हो रहा
शेर अभिमानी पौरूष 
गीदड़ के हत्थे चढ़ रहे 

लगता नहीं क्या हड़प्पा और 
जोदड़ों की ओर हम बढ़ रहे
                                                         (कविता अनवरत-1 2015 में संकलित)
-राम लखारा विपुल

Wednesday, 20 July 2016

बात पते की:- 2 - सर्वश्रेष्ठ स्वादिष्ट व्यंजन

Ram Lakhara Vipul
दुनिया का सर्वश्रेष्ठ स्वादिष्ट व्यंजन क्या है?
भाई हमारे भुक्खड़ पेट से ऐसे स्वादिष्ट सवाल पूछोगे तो वह रसमलाई से लेकर शाही पनीर तक पचासों मिठाईयों, सब्जियों और व्यंजनों के नाम बता देगा। लेकिन हमारा दिमाग इस मामले में अपनी अलग राय रखता है। 
यह भी बड़ी चिंताजनक स्थिति होती है जब पेट और दिमाग दोनों आमने सामने खड़े हो। कल भी ऐसा ही हुआ हमारे साथ, शाम को हम आॅफिस से घर जा रहे थे। रास्तें में पानी पूरी का ठेला देखा तो पेट ने मशविरा दिया कि दोय चार पानी पूरी गटका ली जाय। लेकिन ससुरा दिमाग एक बार फिर से बीच में आकर टंगड़ी फंसा गया। कहने लगा कोय जरूरी नहीं है पानी पूरी खाने की, घर पर धर्मपत्नि ने खाना बनाया है वही खाना, पांच रूपये बचेंगे सो अलग। रूपये बचाने की बात सुनकर हम ने भी दिमाग की बात मान ली और चल दिये घर की तरफ सीधे। जाते ही पत्नि किसी बात पर गुस्सा हो गई, फिर क्या था? 
पानी पूरी तो मिली नहीं पानी पीकर पूरी रात गुजारनी पड़ी!!
तब बिस्तर पर लेटे लेटे हमने सोचा कि उस समय पेट की बात मान ली होती तो अब भूख से नहीं बिलबिलाते।
लेकिन आज दुनिया के सर्वश्रेष्ठ व्यंजन के  बारे में बकौल हमारे दिमाग के दुनिया का सर्वश्रेष्ठ व्यंजन है - सौगंध
और नहीं तो क्या? दुनिया में सबसे ज्यादा खाने वाला व्यंजन है सौगंध। कभी कभी तो हम बैठ कर सोचते है कि सौगंध में जरूर सौ प्रकार की गंध होती होगी। जिसको जो गंध सुहाती है, खा लेता है। सौंगध के भी सौ फ्लेवर होते है- भाई की, बाप की , मां की, पत्नि की, पति की, बहिन की, पड़ोसी की, सर की, फलानी, ढिकानी..............
सबसे अधिक फ्लेवर की जो सौंगध पसंद की जाती है वो है भगवान की सौंगंध। बेचारे भगवान को हर सच झूठ में सौंगध के साथ खा लिया जाता है। 
सौगंध खाने की एक शर्त यह भी है कि झूठी सौंगंध खाई तो जिस फ्लेवर की सौगंध खाई है वह फ्लेवर मर जायेगा। 
इस शर्त में भी खाने वालों को भगवान फ्लेवर की सौगंध स्वादिष्ट लगती है। जानते है कि भगवान अजर, अमर, अविनाशी है। इसलिए सच हो या झूठ भगवान फ्लेवर लोकप्रिय है।
हमारा एक दोस्त बात बात पर पत्नी की सौगंध बड़ी खाता था, पत्नी की सौगंध के नाम पर लोग उस पर विश्वास भी करते थे। बाद में पता चला भईया पत्नी से कुछ ज्यादा ही परेशान था, और सौगंध खाने की शर्त का वास्तविक फायदा उठाना चाहता था।
दिमाग भले ही कहे सौगंध स्वादिष्ट है, पर हमारे पेट को जो स्वादिष्ट लगता है वह धर्मपत्नि जी ही खिलाती है। इसलिए सच पूछो तो हम किसी की सौगंध नहीं खाते, पत्नी की तो बिल्कुल नहीं।

- राम लखारा 'विपुल'

Sunday, 10 July 2016

बात पते की - :1 - चाईनीज माल

Hindi Poems

'अभी मुंह उठा कर कहां चल दिये?' महुरी मुँह बिगाड़ कर बोली।

'कहीँ नहीं? तनिक बाजार जाकर आ रहे है।' बिज्जू ने उतनी ही नरमाई से जवाब दिया।

महुरी- जेब में दो रूपयै है, जो ठुमक ठुमक कर बाजार जा रहे हो। दिनभर तो पानी में बैठी भैंस की तरह घर पर पड़े रहते हो।
बिज्जू- तो यह जो महंगी महंगी साड़िया पहन के बैठी हो, गले पर भर भर के सोना पहना हुआ है। यह क्या अपने अब्बा के घर से लाई हो।
महुरी- मेरे अब्बा का नाम लिया करो। अभी कहे देती हूं।

बिज्जू- अरी महुरी! तुम भी एकदम गजब हो। गलती से यहां आ गई, तुम्हें तो चीन में पैदा होना चाहिए।
महुरी- चीन में??? वो क्यो?
(इससे पहले कि बिज्जू कुछ बोले महुरी कुछ सोच समझ कर फिर से बोल पड़ती है।)
महुरी- अच्छा! अब समझी।

बिज्जू- क्या समझी? जरूर उल्टा ही समझी होगी।
महुरी- कोई उल्टा पुल्टा नहीं सोचा है हमने। बिल्कुल ठीक सोचा है। हमें सुहागरात के दिन से ही शक हो गया था जब तुमने हमारे हाथ का दूध भी नहीं पिया था।  
बिज्जू- अरी महुरी! कैसा शक।
(बिज्जू ने माथा पीट लिया था। महुरी उल्टा सोच चुकी थी।)
महुरी- शक नहीं यकीन कहो। तुम चाहते हो कि हम चीन में पैदा हो, ताकि चाइनीज माल की तरह हमारी भी एक्सपायरी डेट जल्दी निकल जाए, और तुम जल्दी ही किसी दूसरी को घर में घुसा दो। यही न! तो सुन लो। हमने भी अपने अब्बा के यहां गाय का दूध पिया है, इतने  जल्दी नहीं मरेंगे।

बिज्जू- महुरी तुम कहां पहुंच गई हो? तुम भी बाई गाॅड केजरी जैसी हरकते करने लग गई हो। मेरे कहने का मतलब यह नहीं था।
महुरी- तो क्या था तुम्हारा मतलब? जरा बूझो।

बिज्जू - हमारे कहने का मतलब यह था कि तुम्हारी हरकते चीन से मिलती जुलती है, इसलिए तुम्हें चीन में पैदा होना चाहिए था। अब देखों हम तुम्हारे लिए कमाते है, तुम्हें खर्ची देते है और तुम ही हमारे हर काम में टांग अड़ाती हो। ठीक वैसे ही जैसे चीन माल तो हमारे देश में बेचता है, हम पर कमाता है और संयुक्त राष्ट्र में हमारी हर बात पर टंगड़ी फंसा देता है। तो हुई न हरकत चीन जैसी।

महुरी- कोई चीन जैसी हरकत नहीं है हमारी। चलो जाओ बाजार। और हां लौटते हुए हमारे लिए तुम्हारी पसंदीदा खाने की चीज लेते आना।

बिज्जू- क्या जलेबी!

महुरी- नहीं हमारे सैंडिल!!!

- राम लखारा 'विपुल'

Thursday, 30 June 2016

"बात पते की" श्रृंखला फिर से शुरू

प्रिय पाठकों,
           जुलाई से आपके लिए ब्लाॅग पर कुछ होने वाला है!!!
कुछ समय पहले मैनें अपने ब्लाॅग पर "बात पते की" नामक श्रृंखला शुरू की थी, जो किसी कारण वश बंद हो गई थी और बाद में उसके लेख भी ब्लाॅग पर से हटा दिये गये थे। लेकिन अब नए कलेवर, नए रंग और नए विषयों को लेकर यह श्रृंखला फिर से शुरू करने का विचार आया है। पहले यह राजनीतिक व्यंग्य तक सीमित था, अब इसका दायरा अधिक विस्तृत किया जा रहा है। अभी के लिए हर महीने की 10, 20, 30 तारीख को बात पते की लेख पाठकों के लिए ब्लाॅग पर पोस्ट किया जाएगा।
इस संबंध में एक नवाचार यह भी है कि कोई लेखक अपना व्यंग्य लेख बात पते की श्रृंखला में प्रकाशित करना चाहता है तो वह मेरे ईमेल आईडी  lakhararam@gmail.com पर संपर्क कर सकते है। पसंद आने पर इसे आपके नाम के साथ पोस्ट किया जाएगा। आशा है कि इस बार भी बात पते की श्रृंखला को आपका प्यार, प्रतिक्रियाएं मिलेंगी।


- राम लखारा विपुल

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