Friday, 18 December 2015

रिश्वत (Short Story in Hindi)

रिश्वत (Short Story in Hindi)
रामदीन और कालूराम दोनो दोस्त एक दूसरे से आज लगभग पच्चीस वर्षों बाद एक बगीचे में मिले। दोनों एक दूसरे को देखकर यहीं सोच रहें थे कि वक्त की धार कैसे उन दोनों की जवानी को बुढापे की ओर ले जा रही थी। कालूराम जल विभाग में अधिकारी के पद पर हुआ करतें थे और रामदीन उसी कार्यालय में एक साधारण से बाबू थें। पदों में अंतर होने के बावजूद दोनों अच्छे मित्र हुआ करते थे। दोनों अब सेवानिवृति पा चुके थें और अपने अपने बच्चों के साथ अलग अलग शहरों मे रह रहें थे।
रामदीन और कालूराम दोनों गले मिले और गुलमोहर के पौधे के पास एक बेंच पर बैठ गये। दोनों एक दूसरे के विगत वर्षों के बारे में चर्चा करने को उत्सुक थें। रामदीन ने बताया कि उसके दोनों लड़के और एक लड़की अब बड़ें हो चुके हैं, और अपने घर बसा चुके हैं। बातचीत को जारी रखते हुए रामदीन बोलता रहा कि उसका बड़ा बेटा आर्मी में असिस्टेंट कमाण्डेंट हैं और एक खुशहाल जिंदगी जी रहा हैं। गर्व और खुशी के मिश्रण को छलकाते हुए अपने छोटे बेटे के बारे में बताते हुए वों कहने लगे कि मेरा छोटा बेटा एक सफल व्यवसायी बन चुका हैं और देशभर में उसकी व्यवसायिक शाखाएँ हैं। उसने यह भी बताया कि अपने छोटे बेटे के कारण ही वो दुनिया की सैर तक कर चुका हैं। आज स्वंय उसके पास सुख भी है और सम्पति भी। मेरी बेटी की शादी मैने इतने धूमधाम से की है कि उस शादी की मिसाल आज तक हमारे समाज में दी जाती हैं। बेटी की शादी से उसे याद आया कि कालूराम तो शादी में आया ही नही था सो उसने लगे हाथ ही शिकायत कर दी क्यो भाई कालूराम तुम शादी में क्यों नहीं आये? कालूराम की जैसे तंद्रा टूट गयी थी। बोले कि उस समय किसी प्रोजेक्ट मे उलझे होने के कारण वह नहीं आ पाया था।
रामदीन जवाब से संतुष्ट हो बोले कि मेरे जवाई एक निजी कम्पनी में डिवीजन मैनेजर है और आज कम्पनी की सभी सुविधाओं का उपभोग कर रहे हैं। अपनी बेटी के सुखद जीवन की अनुभूति रामदीन की आवाज से ही झलक रहीं थी। इसी तरह रामदीन अपने परिवार के बारे में लगभग आधे घंटे तक बताता रहा।
रामदीन की बातें सुनकर कालूराम एक गहरे ध्यान में खो गया था। उसे याद आ रहा था कैसे रामदीन उस समय अपनी बाबू की तन्खवाह से अपने परिवार का गुजारा चलाने के साथ ही अपने बच्चों को पढा रहा था। उसकी दयनीय स्थिति को देखकर हमेशा कालूराम उसे यहीं शिक्षा देता था कि वो थोड़ी बहुत इधर उधर की कमाई कर लिया करे ताकि अपने बच्चों को वो आराम से पढ़ा सके। पर रामदीन हमेशा कालूराम की बातों का खण्डन किया करता था। रामदीन हमेशा यही तर्क देता था कि मैं अपने बच्चों के पेट में रिश्वत का एक पैसा भी नहीं जाने देना चाहता। अगर मैं रिश्वत लूंगा तो यह तय हैं कि मेरे बच्चे सफल नहीं होंगे और दूसरों के सामने हाथ फैलाते रहेंगें जो मुझे हरगिज मंजूर नहीं। मेरे मानना हैं कि चोरी का पैसा चोर ही बनायेगा। रामदीन की ऐसी बातें सूनकर कालूराम हमेशा उसका यहीं मजाक उड़ाता था कि रामदीन तुम बहुत भले हो। कल की कल देखी जायेगी। अपना आज तो सुधारों कल अपने आप सुधर जायेगा। उसे रामदीन की बाते हमेंशा पुराने विचार लगते थे। वो यह समझता था कि रामदीन समय से काफी पीछे चल रहा हैं जिसका अंदाजा उसे वक्त आने पर पता चलेगा।
कालूराम इस तरह अपने ध्यान में खोते जा रहा था कि किस तरह वो अपने पद का दुरूपयोग कर पैसे बटोर रहा था। उन पैसों से उसने अपने बच्चों को अ्रग्रेजी माध्यम के विद्यालय में शिक्षा दी और अच्छी से अच्छी सुविधाए दी। किस तरह उसके बच्चे खूब आराम से रहते थे और अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए उसने पास के शहर में भेज दिया था। उसके दो लड़के ही थे और हर पिता की तरह वों भी उनका भविष्य सफल करना चाहता था। पौधे में खाद की जगह यदि दही डाल दिया जाये तो पौधा नष्ट तो होगा ही होगा साथ ही भविष्य मे भी उस जगह से किसी और पौधे का उगना अंसभव हैं। ऐसा ही कालूराम के साथ भी हुआ। जिस कमाई से उसने अपने बच्चों का पालन पोषण किया था वो ही कमाई उसकी दुश्मन बन गयी थी। उसे याद आ रहा था कि किस तरह उसके बड़े बेटे ने शराब और स्मैक का नशा सीख लिया था, और उसका नशा छुड़ाने के लिए किस तरह उसने अपनी सारी पूंजी दांव पर लगा दी थी। रामदीन से बिछड़ने के बाद उसकी बाते कालूराम को हमेशा यह याद दिलाती थी कि रामदीन उस समय सही था और वो गलत। फिर उसका छोटा बेटा तो पढ़ाई में बेहद कमजोर निकला और पढ़ाई को अधूरी छोड़कर एक निजी दूकान में नौकरी करने लगा। बच्चों की आदतो की वजह से उसका सारी जायदाद चली गयी थी और सम्पति  के नाम पर उसके पास सिर्फ अपना घर बचा था। उसका गुजारा आज भी पेंशन की वजह से चलता था। उसे आज यह एहसास हो चला था कि चोरी का माल हमेशा मोरी में ही जाता हैं। अपने किये पर वो आज भी पछता रहा हैं, उसे इस बात की सीख भी मिली थी कि किस तरह रामदीन के सिद्धांत उसे सुखी जीवन की ओर ले जा रहे थे और जिस वक्त का अंदाजा वो रामदीन के साथ लगा रहा था वो वक्त आज स्वंय वह जी रहा था।

                                                        लेखक - राम लखारा

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