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Sunday, 19 June 2016

सबसे बड़ा गिफ़्ट (Hindi Love Story)

Ram Lakhara Vipul
रोहन थोड़े गर्म और कंजूस स्वभाव का व्यक्ति था। उसकी पत्नी लीना अपने पति के स्वभाव के विपरीत सौम्य और मृदु स्वभाव की थी। लेकिन दोनों प्यार से रहते थे।
शादी को तीन साल हो रहे थे। लीना अपने स्वभाव से पूरे परिवार को हंसी खुशी चलाती थी वरना केवल रोहन के स्वभाव के दम पर तो एक दिन भी गुजारना मुश्किल था।
'अरे लीना! क्या सोच रही हो?' रोहन ने लीना को सोच में डूबते देखकर कहा।
'हम्म्म्म्म! कुछ नहीं इट्स ओके। आई एम फाइन!' लीना अपना ध्यान तोड़ते हुए बोली।
'नहीं, नहीं। मुझे बताओं। वाट आर यू थिकिंग?' रोहन ने फिर जोर दिया।
'कुछ नहीं रोहन। मैं तो बस सामने उस पेड़ पर बैठे चिड़िया के जोड़े को देख रही थी। वह चिड़ा देखों चिड़िया के आस पास उड़ रहा है, प्यार से उसके सिर पर चोंच मार रहा है। दोनों में कितना प्यार है। है ना!' लीना ने कहा।
'अरे हां! दोनों कितने खुश लग रहे है। एक दूसरे के साथ।' रोहन ने लीना का साथ देते हुए कहा।
'एक औरत के लिए इससे बेहतर कुछ नहीं होता रोहन कि उसे उसका पति प्यार करे, उसे खुश रखे। इन दोनों में मुझे अपना जीवन दिख रहा है, आपके साथ मैं कितनी खुश हूं। मैं भी उस चिड़िया के जैसे ही आपकों देख देख कर खुश होती रहती हूं। वी आर सच ए स्वीट कपल!' लीना लगभग चिड़िया के जैसे ही चहकते हुए बोली।
'अच्छा ऐसी बात है!' रोहन लीना की ऐसी बाते सुनकर उसके स्वभाव पर फिर से मुग्ध हो गया था। किस तरह लीना हर चीज में अच्छा ढूंढ लेती है।
'अरे मुझे आॅफिस जाने में देरी हो रही है। ओके! मैं चलता हूं।' रोहन ने मेज पर रखे हुए अपने टिफिन बाॅक्स को उठाते हुए कहा।
'ओके! ध्यान से जाना और टाइम पर घर आ जाना। आज तुम्हारी पसंद का खाना बनने वाला है।' लीना ने मुस्कुराहट के साथ रोहन को विदा करते हुए कहा।
रोहन अपनी कार से आॅफिस के लिए रवाना हो गया। आज सड़क पर जाम बहुत था। इसलिए रोहन को गाड़ी खड़ी करनी पड़ी। 
रोज रोज होने वाले जाम पर खुन्नस खाकर रोहन स्टीयरिंग पर थपकी मारते हुए दाएं बाएं देखने लगा। तभी उसकी नजर पास ही के पेड़ पर बैठे एक पक्षी के जोड़े पर पड़ गई। यह देखकर उसे सुबह वाली बात और अपनी पत्नी लीना की याद आ गई।
"लीना कितनी मासूम और प्यारे स्वभाव की है। वह हर बात में अच्छा देखती है। मुझ जैसे अजीब स्वभाव वाले व्यक्ति को भी लेकर चल रही है।" यह सोचते हुए आज सुबह ही लीना के कहे हुए शब्द अचानक से उसके कान में गूंज उठे - इन दोनों में मुझे अपना जीवन दिख रहा है, आपके साथ मैं कितनी खुश हूं। मैं भी उस चिड़िया के जैसे ही आपकों देख देख कर खुश होती रहती हूं।
यह बात याद आते ही रोहन का माथा ठनका। उसने पूरी घटना दिमाग में दोहराई तो उसने पाया कि आज सुबह तो वह चिड़ा उस चिड़िया पर प्यार जता रहा था लेकिन लीना ने कहा था कि मैं चिड़िया के जैसे ही आपको देखकर खुश होती हूं। 
रोहन को अपने स्वभाव पर पहली बार ग्लानि हुई। वह सोचने लगा कि लीना तो चिड़िया की भांति मुझे देखकर खुश होती है पर मैंने कभी चिड़े की तरह उससे प्यार नहीं जताया।
इतना सोचते ही उसने गाड़ी वापस घुमायी और बाजार से होते हुए घर पहुंचा।
डोरबेल की आवाज सुनकर लीना ने दरवाजा खोला।
'अरे रोहन! आॅफिस से इतनी जल्दी कैसे?'
'लीना। मैं आॅफिस गया ही नहीं रस्ते से ही वापस आ रहा हूं।' लीना के हाथों में एक पैक की हुई गिफ्ट देते हुए रोहन ने कहा।
'यह क्या है?' लीना ने खुश होते हुए कहा।
खुद ही खोल कर देख लो।
'वाॅव!!! डायमंड सेट! यह मेरे लिए है?'
'हां मेरी जान! तुम्हारे लिए।'
'लेकिन आज तो कोई सालगिरह नहीं है?'
'तुम्हें गिफ्ट देने के लिए मुझे किसी दिन की जरूरत थोड़े ही है। यह तुम्हारे लिए है और हां आज दिन भर मैं तुम्हारे साथ ही हूं।' रोहन ने लीना के गालों पर अपना हाथ रखते हुए कहा।

'अरे वाहहह! आज दिन भर तुम मेरे साथ हो! यह तो इस डायमंड सेट से भी बड़ा गिफ्ट है मेरे लिए।' 

रोहन खुश था लीना को खुश देखकर। लीना खुश थी वास्तविक खुशी पाकर।

समाप्त !
- राम लखारा 'विपुल'

Friday, 18 December 2015

रिश्वत (Short Story in Hindi)

रिश्वत (Short Story in Hindi)
रामदीन और कालूराम दोनो दोस्त एक दूसरे से आज लगभग पच्चीस वर्षों बाद एक बगीचे में मिले। दोनों एक दूसरे को देखकर यहीं सोच रहें थे कि वक्त की धार कैसे उन दोनों की जवानी को बुढापे की ओर ले जा रही थी। कालूराम जल विभाग में अधिकारी के पद पर हुआ करतें थे और रामदीन उसी कार्यालय में एक साधारण से बाबू थें। पदों में अंतर होने के बावजूद दोनों अच्छे मित्र हुआ करते थे। दोनों अब सेवानिवृति पा चुके थें और अपने अपने बच्चों के साथ अलग अलग शहरों मे रह रहें थे।
रामदीन और कालूराम दोनों गले मिले और गुलमोहर के पौधे के पास एक बेंच पर बैठ गये। दोनों एक दूसरे के विगत वर्षों के बारे में चर्चा करने को उत्सुक थें। रामदीन ने बताया कि उसके दोनों लड़के और एक लड़की अब बड़ें हो चुके हैं, और अपने घर बसा चुके हैं। बातचीत को जारी रखते हुए रामदीन बोलता रहा कि उसका बड़ा बेटा आर्मी में असिस्टेंट कमाण्डेंट हैं और एक खुशहाल जिंदगी जी रहा हैं। गर्व और खुशी के मिश्रण को छलकाते हुए अपने छोटे बेटे के बारे में बताते हुए वों कहने लगे कि मेरा छोटा बेटा एक सफल व्यवसायी बन चुका हैं और देशभर में उसकी व्यवसायिक शाखाएँ हैं। उसने यह भी बताया कि अपने छोटे बेटे के कारण ही वो दुनिया की सैर तक कर चुका हैं। आज स्वंय उसके पास सुख भी है और सम्पति भी। मेरी बेटी की शादी मैने इतने धूमधाम से की है कि उस शादी की मिसाल आज तक हमारे समाज में दी जाती हैं। बेटी की शादी से उसे याद आया कि कालूराम तो शादी में आया ही नही था सो उसने लगे हाथ ही शिकायत कर दी क्यो भाई कालूराम तुम शादी में क्यों नहीं आये? कालूराम की जैसे तंद्रा टूट गयी थी। बोले कि उस समय किसी प्रोजेक्ट मे उलझे होने के कारण वह नहीं आ पाया था।
रामदीन जवाब से संतुष्ट हो बोले कि मेरे जवाई एक निजी कम्पनी में डिवीजन मैनेजर है और आज कम्पनी की सभी सुविधाओं का उपभोग कर रहे हैं। अपनी बेटी के सुखद जीवन की अनुभूति रामदीन की आवाज से ही झलक रहीं थी। इसी तरह रामदीन अपने परिवार के बारे में लगभग आधे घंटे तक बताता रहा।
रामदीन की बातें सुनकर कालूराम एक गहरे ध्यान में खो गया था। उसे याद आ रहा था कैसे रामदीन उस समय अपनी बाबू की तन्खवाह से अपने परिवार का गुजारा चलाने के साथ ही अपने बच्चों को पढा रहा था। उसकी दयनीय स्थिति को देखकर हमेशा कालूराम उसे यहीं शिक्षा देता था कि वो थोड़ी बहुत इधर उधर की कमाई कर लिया करे ताकि अपने बच्चों को वो आराम से पढ़ा सके। पर रामदीन हमेशा कालूराम की बातों का खण्डन किया करता था। रामदीन हमेशा यही तर्क देता था कि मैं अपने बच्चों के पेट में रिश्वत का एक पैसा भी नहीं जाने देना चाहता। अगर मैं रिश्वत लूंगा तो यह तय हैं कि मेरे बच्चे सफल नहीं होंगे और दूसरों के सामने हाथ फैलाते रहेंगें जो मुझे हरगिज मंजूर नहीं। मेरे मानना हैं कि चोरी का पैसा चोर ही बनायेगा। रामदीन की ऐसी बातें सूनकर कालूराम हमेशा उसका यहीं मजाक उड़ाता था कि रामदीन तुम बहुत भले हो। कल की कल देखी जायेगी। अपना आज तो सुधारों कल अपने आप सुधर जायेगा। उसे रामदीन की बाते हमेंशा पुराने विचार लगते थे। वो यह समझता था कि रामदीन समय से काफी पीछे चल रहा हैं जिसका अंदाजा उसे वक्त आने पर पता चलेगा।
कालूराम इस तरह अपने ध्यान में खोते जा रहा था कि किस तरह वो अपने पद का दुरूपयोग कर पैसे बटोर रहा था। उन पैसों से उसने अपने बच्चों को अ्रग्रेजी माध्यम के विद्यालय में शिक्षा दी और अच्छी से अच्छी सुविधाए दी। किस तरह उसके बच्चे खूब आराम से रहते थे और अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए उसने पास के शहर में भेज दिया था। उसके दो लड़के ही थे और हर पिता की तरह वों भी उनका भविष्य सफल करना चाहता था। पौधे में खाद की जगह यदि दही डाल दिया जाये तो पौधा नष्ट तो होगा ही होगा साथ ही भविष्य मे भी उस जगह से किसी और पौधे का उगना अंसभव हैं। ऐसा ही कालूराम के साथ भी हुआ। जिस कमाई से उसने अपने बच्चों का पालन पोषण किया था वो ही कमाई उसकी दुश्मन बन गयी थी। उसे याद आ रहा था कि किस तरह उसके बड़े बेटे ने शराब और स्मैक का नशा सीख लिया था, और उसका नशा छुड़ाने के लिए किस तरह उसने अपनी सारी पूंजी दांव पर लगा दी थी। रामदीन से बिछड़ने के बाद उसकी बाते कालूराम को हमेशा यह याद दिलाती थी कि रामदीन उस समय सही था और वो गलत। फिर उसका छोटा बेटा तो पढ़ाई में बेहद कमजोर निकला और पढ़ाई को अधूरी छोड़कर एक निजी दूकान में नौकरी करने लगा। बच्चों की आदतो की वजह से उसका सारी जायदाद चली गयी थी और सम्पति  के नाम पर उसके पास सिर्फ अपना घर बचा था। उसका गुजारा आज भी पेंशन की वजह से चलता था। उसे आज यह एहसास हो चला था कि चोरी का माल हमेशा मोरी में ही जाता हैं। अपने किये पर वो आज भी पछता रहा हैं, उसे इस बात की सीख भी मिली थी कि किस तरह रामदीन के सिद्धांत उसे सुखी जीवन की ओर ले जा रहे थे और जिस वक्त का अंदाजा वो रामदीन के साथ लगा रहा था वो वक्त आज स्वंय वह जी रहा था।

                                                        लेखक - राम लखारा

Thursday, 21 August 2014

नींव Neenv Short story in hindi


Writer- Ram Chandra lakhara
कमलेश अपने आॅफिस में एक आॅडिटर के रूप में काम करता था। आॅडिटर के रूप में वह एक ईमानदार व्यक्ति भी था। इसी कारण उसके ज्यादातर अधीनस्थ कर्मचारी जिनकी वह आॅडिट किया करता था, उससे चिढ़ते भी थें। बड़े कार्यालय में एकमात्र आॅडिटर होने के कारण हाजिरी रजिस्टर में उसका नाम अधिकारियों और बाबुओं के क्रम में सबसे नीचे लिखा होता था।
एक दिन उसके ही किसी सहकर्मचारी ने उसे नीचा दिखाने के इरादे से कहा कि- “अरे कमलेश! तुम इतने छोटे हो इस आॅफिस में कि तुम्हारा नाम हाजिरी रजिस्टर में सबसे नीचे लिखा हैं।”
कमलेष ने उसकी तरफ देखा और मुस्कुराकर कहा “नींव तो हमेशा मजबूत होनी चाहिए।”
उस साथी का चेहरा देखने लायक था।

 लेखक -रामचन्द्र लखारा
  

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