काव्य प्रेरणा - राम लखारा 'विपुल' का कविता संसार
Poetry World of Ram Lakhara 'Vipul'
Pages
Home
Shayari
Geet
Chhand
Articles
Stories
Poimages
Policies
Contact us
All Posts
Welcome Dear Readers।
Wednesday, 13 January 2016
परहित Hindi Poem
परहित
रात गगन में तारे अगणित,
जड़वत हो अनजान खड़े है,
छोटे छोटे दिखे भले पर
मन ही मन अभिमान बड़े है।
ऐसे में इन सबका अब तो
सबक सीखना निश्चित है
परहित पाठ पढा़ने को
सूरज निकलना निश्चित है।
- राम लखारा 'विपुल'
No comments:
Post a Comment
Newer Post
Older Post
Home
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
join us on facebook...
No comments:
Post a Comment