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Wednesday, 7 December 2016
Thursday, 30 June 2016
समाज को समर्पित तीन मुक्तक
सौंपकर ज्योति प्रण की आओं मिलकर तम हटाए
साथ बैठे साथ गाए साथ मिलकर गम बटांए
समाज के विकास की बस इतनी सी है बात भर
एक कदम आप बढाओं एक कदम हम बढाए।
- कवि राम लखारा 'विपुल'
काल का विकराल पहिया हिम्मत से चलाना होगा
समाज के इस बाग को मेहनत से फलाना होगा
दिन दूनी और रात चैगुनी गति से गर बढ़ना है
मिलकर के हर घर में ज्ञान का दीप जलाना होगा।
- कवि राम लखारा 'विपुल'
मिल जुल कर हम खुशियों का नया जहान बना ले आओं
प्रेम स्नेह और दया भाव से नव खलिहान बना ले आओं
आओं मिलकर गले लगे और शिकवें सारे भूल जाए
भूल पुरानी बातें हम नया हिंदुस्तान बना ले आओं।
- कवि राम लखारा 'विपुल'
Wednesday, 8 June 2016
Tuesday, 26 April 2016
Monday, 18 April 2016
Friday, 8 April 2016
हिन्दू नववर्ष 2073 की शुभकामनाएं
आज ईस्वी सन् का 8 अप्रैल है, वहीं एक साधारण सी तारीख। अप्रैल का आठवां दिन जो कल 9 हो जाएगा। लेकिन विक्रमी संवत् में आज एक खास तारीख है चैत्र शुक्ल प्रतिपदा संवत् 2073। जी हां इसी दिन को हिन्दू नववर्ष के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन से नया वर्ष लगता है, और इस नव वर्ष का उत्सव केवल मानव नहीं बल्कि पूरा जगत मनाता है। कैसे? इस समय प्रकृति अपनी बांसती चुनर को ओढ रही होती है, जलवायु न गर्म होती है न शीत। पूरे भारतवर्ष में इसी दिन को हिन्दू नववर्ष, नवरात्रि प्रारंभ, चेटीचंड, गुड़ी पर्व अलग अलग रूप में मनाया जाता है। आप सभी मेरे प्रिय पाठकों को चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की अनेकानेक शुभकामनाएं, आज के लिए मेरी एक छोटी कविता भी आपकों प्रस्तुत है-
यह साल नया कुछ ऐसा कर दे, जीवन में नित मौज रहे
खुशियों से झोली सबकी भरे , उमंग नवेली रोज रहे
हर रोज रहे पक्षी को पानी, रोज भूख को अन्न मिले
रोज ईद संग दीप जले और रोज होली के रंग मिले
मिले मानवता सजी धजी और बेटी का भी मान रहे
खेतीहरों की पीर मिटे और भारत भू जय गान रहे।
- राम लखारा विपुल
Wednesday, 30 March 2016
Tuesday, 8 March 2016
अंतराष्ट्रीय महिला दिवस
आज 8 मार्च है अंतराष्ट्रीय महिला दिवस, साल का वह एकमात्र दिन जब सभी लोग महिलाओं के उत्थान की बात करते है। उसे पुरूष की सामंतवादी प्रभुत्वपूर्ण सोच से उबारने के तरीके सुझाते है और उसकी पैरोकारी करते है। हम सब जीवन के हर मोड़ पर हर पड़ाव पर कहीं न कही, किसी न किसी औरत से जुड़ाव में रहते है। चाहे वह मां हो, महबूबा हो, पत्नी हो या चाहे बेटी हो। हमारा उनसे जुड़ाव महज इसलिए नहीं होता कि प्रकृति ने हमें इसके लिए बाध्य किया है, बल्कि इसलिए भी कि हमें पग पग पर एक मजबूत हाथ की आवश्यकता होती है और कहना न होगा कि औरत की सहनशीलता, दृढता, स्नेह, सोच और सूझबूझ सबसे अलग है, विलक्षण है। औरत किसी पंगत का भोज नहीं है जिसे भाया जितना खाया और झूठा छोड़ दिया, वह पूजा की थाली का वह योग्य फूल है जो देवता को सबसे पहले समर्पित किया जाता है। हम सब इतना प्रण भी कर ले कि जो नारी हमसे जीवन में जुड़ी हुई है उसका सम्मान करेंगे और उसे समझने का प्रयत्न करंेगे तो हमारे हिस्से का महिला दिवस हम ईमानदारी से मना रहें होंगे।
अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर डॉ उर्मिलेश का एक दोहा याद आता है-
तितली,हिरणी,मोरनी,कोयल,बत्तख,मीन।
सृष्टि पिता की बेटियां कितनी शोख हसीन।।
अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर डॉ उर्मिलेश का एक दोहा याद आता है-
तितली,हिरणी,मोरनी,कोयल,बत्तख,मीन।
सृष्टि पिता की बेटियां कितनी शोख हसीन।।
Tuesday, 23 February 2016
Monday, 15 February 2016
Thursday, 21 January 2016
कोयल की व्यथा Hindi Kavita
Koyal Ki Vyatha
पिंजर में बंद कोयल की सुध लेगा कौन?
कूक की मीठी वाणी में दर्द सुनेगा कौन?
गुण की थैली पूर्ण भरी
प्रशस्तियों की पोथी हो
निज प्रतिभा से जग में
चाहे वाहावाही होती हो
लेकिन पैरों में जब जंजीर गुलामी होती है
तब नरमी से तन मन के जख्म छुएगा कौन?
कूक की मीठी वाणी में दर्द सुनेगा कौन?
कुछ आते है हाथ में लेके
तख्ती सत्य के दान की
कुछ लाते है हाथ में गोले
इच्छा ले पिंजर प्राण की
किंतु हाथ में ले समय का प्रतिदान पुराना
उसका दामन कर्मठता से पूर्ण भरेगा कौन?
कूक की मीठी वाणी में दर्द सुनेगा कौन?
भर भर लोचन नीरों से
व्यथा गान आसान है
कठिन मगर जीवन में
धूमिल स्वप्न निर्माण है
पहली पंक्ति में आकर कंधे से मिलाकर कंधा
नव जीवन के सुन्दर नव स्वप्न बुनेगा कौन?
कूक की मीठी वाणी में दर्द सुनेगा कौन?
- राम लखारा 'विपुल'
Wednesday, 13 January 2016
Tuesday, 29 December 2015
प्रकाशित - कविता
पश्चिमी राजस्थान के जोधपुर में संपादक श्री अनिल अनवर के संपादन में प्रकाशित हो रही साहित्यिक पत्रिका मरू गुलशन में प्रकाशित एक कविता -
![]() |
| Ram Lakhara Vipul Published Poem |
Saturday, 12 December 2015
कविता- मेरा परिचय
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| Poetry of Ram Lakhara |
सागर से परित्यक्त होकर भी
जीवन का नव नाद फूंकता
कोलाहल के दुरूह दौर में
अनहद एक आवाज घोलता।
बिछड़न का हूं प्रथम स्वर मैं
प्रथम शब्द हूं बिरह गीत का
प्रथम प्रमाण हूं पल भर में ही
मिटने वाली क्षणिक प्रीत का।
अधिक नहीं है मेरा परिचय
अधिक नहीं है मेरा परिचय
कभी राजा रहा अब रंक हूं
प्रिय मिलन की राग छेड़ता
चिर विरह लिप्त मैं शंख हूं।
-राम लखारा 'विपुल'
Saturday, 3 January 2015
Saturday, 27 December 2014
Monday, 22 September 2014
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