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Wednesday, 7 December 2016

'जैसलमेर के नाम पाती' कविता

दिांक 04 दिसबंर 2016 को बीकानेर से प्रकाशित दैनिक अखबार दैनिक युगपक्ष में प्रकाशित कविता-



Thursday, 30 June 2016

समाज को समर्पित तीन मुक्तक

Hindi Poems


सौंपकर ज्योति प्रण की आओं मिलकर तम हटाए
साथ बैठे साथ गाए साथ मिलकर गम बटांए
समाज के विकास की बस इतनी सी है बात भर
एक कदम आप बढाओं एक कदम हम बढाए।
- कवि राम लखारा 'विपुल'


काल का विकराल पहिया हिम्मत से चलाना होगा
समाज के इस बाग को मेहनत से फलाना होगा
दिन दूनी और रात चैगुनी गति से गर बढ़ना है
मिलकर के हर घर में ज्ञान का दीप जलाना होगा।
- कवि राम लखारा 'विपुल'

मिल जुल कर हम खुशियों का नया जहान बना ले आओं
प्रेम स्नेह और दया भाव से नव खलिहान बना ले आओं
आओं मिलकर गले लगे और शिकवें सारे भूल जाए
भूल पुरानी बातें हम नया हिंदुस्तान बना ले आओं।
- कवि राम लखारा 'विपुल'

Wednesday, 8 June 2016

एक मुक्तक - Shayari

हाथों    मेहंदी,  होठो    लाली,  पैरो   पर    महावर   है
बिंदी,  काजल,  आंखे,  जुल्फे  सबके सब हमलावर है
कहने की यह बात नहीं कि समझाना भी मुश्किल कि
ऐसे  दिलकश हमलों  पर तो जान  प्रिये न्यौछावर है।
                                                                     -  विपुल


Hindi Poems

Tuesday, 26 April 2016

नई सुबह - Poem

Hindi Poems


नई सुबह की राह में
बिछतें तारे रोज
जुगनू भी ज्योति लेकर
करते उसकी खोज

चांद भी आधा होता
कभी रहता पूरा
दिवस राजा बनने का
स्वप्न सदा अधूरा

लाख करे जोर पर
पहलें कहां मिलता है
तय समय पर ही नित्य
नया सूर्य खिलता है।

                 - राम लखारा विपुल

Monday, 18 April 2016

कैसा अरे! श्रृंगार है

Love poems shayari
चित्र साभार -behance.net

जुल्फ के साये में हम 
              खो न जाए डर है यह
अधर अंकित तिल है 
                    मेरी थकन का घर है यह
सादगी है देह की 
                 जो रूप का सिरमौर है
सुन्दरी सुलोचना जिस-
               की ना उपमा और है
और मिलन होगा कहां 
                     अधर स्वंय अभिसार है
कैसा अरे! श्रृंगार है !
                     

                                                - राम लखारा विपुल

Friday, 8 April 2016

हिन्दू नववर्ष 2073 की शुभकामनाएं

आज ईस्वी सन् का 8 अप्रैल है, वहीं एक साधारण सी तारीख। अप्रैल का आठवां दिन जो कल 9 हो जाएगा। लेकिन विक्रमी संवत् में आज एक खास तारीख है चैत्र शुक्ल प्रतिपदा संवत् 2073। जी हां इसी दिन को हिन्दू नववर्ष के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन से नया वर्ष लगता है, और इस नव वर्ष का उत्सव केवल मानव नहीं बल्कि पूरा जगत मनाता है। कैसे? इस समय प्रकृति अपनी बांसती चुनर को ओढ रही होती है, जलवायु न गर्म होती है न शीत। पूरे भारतवर्ष में इसी दिन को हिन्दू नववर्ष, नवरात्रि प्रारंभ, चेटीचंड, गुड़ी पर्व अलग अलग रूप में मनाया जाता है। आप सभी मेरे प्रिय पाठकों को चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की अनेकानेक शुभकामनाएं, आज के लिए मेरी एक छोटी कविता भी आपकों प्रस्तुत है-

यह साल नया कुछ ऐसा कर दे, जीवन में नित मौज रहे
खुशियों से झोली सबकी भरे , उमंग नवेली रोज रहे
हर रोज रहे पक्षी को पानी, रोज भूख को अन्न मिले
रोज ईद संग दीप जले और रोज होली के रंग मिले
मिले मानवता सजी धजी और बेटी का भी मान रहे
खेतीहरों की पीर मिटे और भारत भू जय गान रहे। 
                                                    - राम लखारा विपुल



Hindu New year Vikrami samwat Shayari

Tuesday, 8 March 2016

अंतराष्ट्रीय महिला दिवस

आज 8 मार्च है अंतराष्ट्रीय महिला दिवस, साल का वह एकमात्र दिन जब सभी लोग महिलाओं के उत्थान की बात करते है। उसे पुरूष की सामंतवादी प्रभुत्वपूर्ण सोच से उबारने के तरीके सुझाते है और उसकी पैरोकारी करते है। हम सब जीवन के हर मोड़ पर हर पड़ाव पर कहीं न कही, किसी न किसी औरत से जुड़ाव में रहते है। चाहे वह मां हो, महबूबा हो, पत्नी हो या चाहे बेटी हो। हमारा उनसे जुड़ाव महज इसलिए नहीं होता कि प्रकृति ने हमें इसके लिए बाध्य किया है, बल्कि इसलिए भी कि हमें पग पग पर एक मजबूत हाथ की आवश्यकता होती है और कहना न होगा कि औरत की सहनशीलता, दृढता, स्नेह, सोच और सूझबूझ सबसे अलग है, विलक्षण है। औरत किसी पंगत का भोज नहीं है जिसे भाया जितना खाया और झूठा छोड़ दिया, वह पूजा की थाली का वह योग्य फूल है जो देवता को सबसे पहले समर्पित किया जाता है। हम सब इतना प्रण भी कर ले कि जो नारी हमसे जीवन में जुड़ी हुई है उसका सम्मान करेंगे और उसे समझने का प्रयत्न करंेगे तो हमारे हिस्से का महिला दिवस हम ईमानदारी से मना रहें होंगे।

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर डॉ उर्मिलेश का एक दोहा याद आता है-

तितली,हिरणी,मोरनी,कोयल,बत्तख,मीन।
सृष्टि पिता की बेटियां कितनी शोख हसीन।।

Ram Lakhara Vipul Poetry

Tuesday, 23 February 2016

नज्म Hindi Shayari

बहुत दिनों बाद आपके लिए पेश है अपनी नज्म के दो कता़ । मेरी रचना आपको कैसी लगी अपनी टिप्पणी के माध्यम से जरूर बताए-

Hindi Shayari

Monday, 15 February 2016

दैनिक युगपक्ष बीकानेर में

दैनिक युगपक्ष बीकानेर में प्रकाशित कविता 'मैं अर्जुन हूं'

Ram Lakhara Hindi Poems

Thursday, 21 January 2016

कोयल की व्यथा Hindi Kavita

Koyal Ki Vyatha





पिंजर में बंद कोयल की सुध लेगा कौन?
कूक की मीठी वाणी में दर्द सुनेगा कौन?

गुण की थैली पूर्ण भरी
प्रशस्तियों की पोथी हो
निज प्रतिभा से जग में
चाहे वाहावाही होती हो
लेकिन पैरों में जब जंजीर गुलामी होती है
तब नरमी से तन मन के जख्म छुएगा कौन?
कूक की मीठी वाणी में दर्द सुनेगा कौन?

कुछ आते है हाथ में लेके
तख्ती सत्य के दान की
कुछ लाते है हाथ में गोले
इच्छा ले पिंजर प्राण की
किंतु हाथ में ले समय का प्रतिदान पुराना
उसका दामन कर्मठता से पूर्ण भरेगा कौन?
कूक की मीठी वाणी में दर्द सुनेगा कौन?

भर भर लोचन नीरों से
व्यथा गान आसान है
कठिन मगर जीवन में
धूमिल स्वप्न निर्माण है
पहली पंक्ति में आकर कंधे से मिलाकर कंधा
नव जीवन के सुन्दर नव स्वप्न बुनेगा कौन?
कूक की मीठी वाणी में दर्द सुनेगा कौन?

- राम लखारा 'विपुल'

Wednesday, 13 January 2016

परहित Hindi Poem

परहित


रात गगन में तारे  अगणित,
जड़वत  हो  अनजान  खड़े है,
छोटे  छोटे   दिखे   भले    पर
मन ही मन अभिमान बड़े है।

ऐसे  में   इन  सबका  अब  तो
सबक  सीखना     निश्चित  है
परहित   पाठ    पढा़ने        को
 सूरज   निकलना   निश्चित है।


- राम लखारा 'विपुल'

Tuesday, 29 December 2015

प्रकाशित - कविता

पश्चिमी राजस्थान के जोधपुर में संपादक श्री अनिल अनवर के संपादन में प्रकाशित हो रही साहित्यिक पत्रिका मरू गुलशन में प्रकाशित एक कविता -


Hindi Poem
Ram Lakhara Vipul Published Poem

Saturday, 12 December 2015

कविता- मेरा परिचय

Poetry of Ram Lakhara


सागर से परित्यक्त   होकर  भी 
जीवन  का   नव    नाद  फूंकता
कोलाहल   के   दुरूह    दौर   में
अनहद   एक   आवाज   घोलता।

बिछड़न  का  हूं  प्रथम  स्वर मैं
प्रथम  शब्द  हूं  बिरह  गीत  का
प्रथम  प्रमाण  हूं  पल  भर में ही
मिटने  वाली  क्षणिक  प्रीत  का।

अधिक  नहीं  है   मेरा  परिचय 
कभी  राजा  रहा    अब  रंक   हूं
प्रिय  मिलन   की  राग   छेड़ता
चिर   विरह   लिप्त  मैं  शंख हूं।

                                                     -राम लखारा 'विपुल'

Saturday, 3 January 2015

श्रृंगार रस मुक्तक

Ram Lakhara poetry
 जो तुझसे प्यार है मेरा वो बहुतो को चुभता है ,
जैसे सुर्ख गुलाबी फूल संग काँटों के उगता है ,
जातां कितने भी कर ले वो मगर मालूम नहीं उनको
मैं तो वो मुसाफिर हु जो बस मंजिल पर रुकता है।
-राम लखारा

Saturday, 27 December 2014

Hindi Muktak Poetry

                      तुझे चाहना तुझे पाना, यह मेरी ज़ुस्तज़ु अब है ,
                       मेरे दीवानेपन की भी थोड़ी सी गुफ्तगू अब है ,
                         बड़ा ही शोख चेहरा है तेरा ऐ हुस्न की रानी ,
                    जिधर फेरु नज़र अपनी वही बस तू ही तू अब है।
                                           -राम लखारा

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