कैसा अरे! श्रृंगार है
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चित्र साभार -behance.net |
जुल्फ के साये में हम
खो न जाए डर है यह
अधर अंकित तिल है
मेरी थकन का घर है यह
सादगी है देह की
जो रूप का सिरमौर है
सुन्दरी सुलोचना जिस-
की ना उपमा और है
और मिलन होगा कहां
अधर स्वंय अभिसार है
कैसा अरे! श्रृंगार है !
- राम लखारा विपुल
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