Showing posts with label श्रृंगार रस. Show all posts
Showing posts with label श्रृंगार रस. Show all posts
Wednesday, 8 June 2016
Wednesday, 11 May 2016
तय मान लीजिए - घनाक्षरी छंद
![]() |
| Pic Courtesy- Google |
काली काली राते जब खाली खाली लागे जागे
नींद का हुआ व्यापार तय मान लीजिए।
बिन बात हंसने जो लग जाओ दिन रात
प्रेम के हुए बीमार तय मान लीजिए।
देख के प्रिय का भाल, लाल लाल होय गाल
प्रेम का चढा खुमार तय मान लीजिए।
अंग में उमंग का जो रंग चढ जाए तब
हो गया तुम्हें भी प्यार तय मान लीजिए।
- राम लखारा विपुल
Monday, 18 April 2016
Tuesday, 23 February 2016
Wednesday, 13 May 2015
Saturday, 3 January 2015
Monday, 22 September 2014
Friday, 20 June 2014
Subscribe to:
Posts (Atom)









